पांच पैसे में महीने भर इलाज

आशीष पांडेय, कानपुर। होम्योपैथी के जनक हैनीमैन अगर जिंदा होते तो सरकारी होम्योपैथी की दशा देखकर उन्हें भी शर्म आ जाती। मानते है कि होम्योपैथी में उपचार सस्ता है लेकिन इतना भी नहीं कि पांच पैसे में महीने भर की दवा मिल जाये। मगर प्रदेश सरकार यह कमाल करके दिखा रही है। मरीजों के हिस्से में दवा के नाम पर पांच पैसे ही आ रहे हैं, वाबजूद उसके बड़ी मशीनरी इस चिकित्सा पद्धति को अपने कंधों पर ढो रही है।

बुधवार को विश्व होम्योपैथी दिवस है। इसके लिए जब हमने विभाग की नब्ज टटोली तो हास्यास्पद स्थिति नजर आई। एक बार तो इस बात का भी अहसास हुआ कि आखिर लकीर पीटने की जरूर क्या है। जितना पैसा मरीजों को दवा के लिए दिया जा रहा है, उससे कई गुना राशि अस्पतालों और स्टाफ के वेतन पर खर्च की जा रही है। जबकि मरीजों के हाथों में कुछ नहीं आ रहा। अब जरा आंकड़ों पर नजर डालिए।

जिले में 23 होम्योपैथी चिकित्सालय है, जिनमें नौ शहरी क्षेत्र में हैं। एक चिकित्सालय उर्सला में भी चलता है। पिछले साल का आंकड़ा बताता है कि इन चिकित्सालयों में सवा चार लाख मरीज ओपीडी में आए और उन्हे दवा दी गई। इसके बाद जब होम्योपैथी अधिकारी से दवा के बजट के बारे में पूछा तो जुबान लड़खड़ा गयी। बताया कि पिछले साल साढे़ तीन लाख रुपये आये थे। हिसाब लगाया तो एक मरीज को साल भर में पूरा रुपया भी नहीं मिला। प्रति मरीज पांच पैसे प्रति महीना नसीब में आया। अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते है कि इस पांच पैसे में असाध्य रोगों को उड़नछू करने का दावा कितना पुख्ता है। अब जरा निजी होम्योपैथी चिकित्सकों पर नजर डालिए।

हफ्ता-दस दिन की दवा तीन से पांच सौ रुपये के बीच मिल रही है। जब कुछ चिकित्सकों से बात की तो सरकारी बजट सुनकर दंग रहे गए। उनका कहना था कि दवाएं काफी महंगी हुई है। अब कई नये उत्पाद भी बाजार में आए है जो इस चिकित्सा में बेहद कारगर साबित हो रहे हैं। वहीं सरकारी चिकित्सकों का कहना है कि उनके हाथ बंधे हुए है। सरकार को चाहिए कि इस पद्धति को जिंदा करें क्योंकि अब एलोपैथी के साइड इफेक्ट से बचने के लिए लोग को अपना रहे हैं।