मड़ई में रंगीन रामायण की पहली प्रति

वाराणसी, [कुमार अजय]। सफेद-स्याह परछाइयों में ठिठका सा खड़ा 19वीं सदी का शुरुआती दौर। जीवन के हर क्षेत्र को चटख रंगों की तलाश। फिल्मों में मगजमारी टेक्नीकलर को पर्दे पर उतारने की। साहित्य को प्रतीक्षा रंगीन चित्रों से पन्नों को संवारने की। प्रयास सफल हुए 1901 में जब मुंबई के छापाखानों से रंगीन पुस्तकों की पहली खेप निकली। सबसे ज्यादा मांग रही रंगीन छापों वाली गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस की। अब दुर्लभ की श्रेणी में शामिल इस रामायण की पहली प्रति वाराणसी की सीमा से सटे करडुआ गांव (खमरिया) के एक कुटीर संग्रहालय में है।

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फ्रांसीसी में प्रकाशित हुई रामायण

इस दुर्लभ ग्रंथ को स्पर्श करने की लालसा से जब हम करेडुआ पहुंचे तो संग्रहालय के कर्ताधर्ता पांडुलिपि विशेषज्ञ डॉ. उदयशंकर दुबे से हुई मुलाकात। थोड़ी ही देर में देश की पहली रंगीन चित्रमय रामायण सामने थी। उन्होंने बताया कि बीएचयू चिकित्सा विज्ञान संस्थान में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख और गोस्वामी तुलसी दास जी की कृतियों के शोध और खोज में सतत सक्रिय डॉ. विजयनाथ मिश्र के साथ कई प्रदेशों की खाक छानने के बाद यह दुर्लभ प्रति आखिर मुंबई से प्राप्त हुई। इस ग्रंथ की भूमिका रामेश्वर भट्ट (आगरा कॉलेज) ने लिखी है। निर्णय सागर प्रेस के मालिक तुकाराम जावजी ने विज्ञप्ति शीर्षक से ग्रंथ के प्रकाशन के मंतव्य को स्पष्ट किया है। जीर्ण हो चुकी पुस्तक का पहला पन्ना खोलने के बाद रंगीन अक्षरों से छपे दोहों, छंदों और सोरठों के अलावा लालित्यपूर्ण अल्पनाओं के अंकन और विशुद्ध मराठी शैली के चित्रांकन ने नजरें बांध लीं।

चित्रांकन तो बस वाह!

लगभग एक दर्जन तस्वीरों वाले इस ग्रंथ के चित्र देखने के बाद मुंह से सिर्फ वाह निकलता है। सातवें आसमान को स्पर्श करती कल्पनाओं की उड़ान और जलरंगों से उनमें फूंके गए प्राण जैसे अब बोले-तब बोले। देवी सीता से भिक्षा मांगते दाढ़ी वाले छलिया रावण का चित्र दुर्लभतम् है। नारी पात्रों के पहनावे में भी मराठी वेशभूषा का प्रभाव है।

और ..आठवां कांड भी

मुंबई के निर्णय सागर प्रेस में प्रकाशित मानस की इस प्रति में बालकांड से उत्तरकांड तक की कथा तो है ही, आठवें कांड के रूप में लव-कुश कांड भी है।